तू मेरा इम्तिहाँ, ऐसा तो न ले ज़ालिम
ये शख्सियत मेरी, तेरी ही कढ़ाई हुई है
मैं डूब तो जाऊँ, मग़र कहीं तू भूला तो नहीं
ये मेरी कश्ती भी तेरी ही बनाई हुई है
मेरी चीखें, तुझ तक पहुँचती भी कैसे
तूने कानों में जो रुई बिठाई हुई है
फिर सबको दिखला के, अब क्या डालता है पानी
जब यह आग भी तेरी ही लगाई हुई है
उठा जमीं से फ़लक पर तूने ही बिठाया था
और आज, तूने ही मुझ को कर दिया ख़ाक
जब इल्म, मेरे रहने का अब तुझे था ही नहीं
फ़िर क्यों रोता फिरता है, यूँ लेकर मेरी राख
- अंशुमान

