एक दिन अपनी तस्वीर से मिलने की हुई कामना
और हो गया, एक आईने से आमना सामना
में मुस्कुराया, तो वो भी मुस्कुराई
में सकुचाया तो वो भी सकुचाई
फिर गुस्से में मैंने आँख चढ़ाई
तो वो भी, जरा न शरमाई
बिना एक क्षण गवाए, उसने भी मुझे
उतने ही तेवर से आँख दिखाई
यह तो गज़ब है अजूबा
देख कर हुआ में अचम्भित
मेरी तस्वीर को ही नहीं रचता, ये आइना
इसे तो मेरी भावना भी है विदित
लेकिन, यह सोच हुआ में चिंतित
की इस आईने की हर तस्वीर है क्षणिक
हर पल ये रचता है, एक नयी तस्वीर पर
बीतें क्षणों में से, इसे कुछ भी नहीं विस्मृत
आखिर, कौन इसकी तस्वीरों को
है, इतने तीव्रता से मिटाता
हर क्षण, बनती इसमें एक नयी तस्वीर
फिर, अगले ही पल कौन इसे चमकाता
इसकी बीमारी, तो शायद मैंने ही नहीं पहचानी
इसे तो है, लगता अल्पकालिक स्मृति की हानि
इस जीवन कथा का हर क्षण होते विस्मृत
देख कर मेरा मन हुआ कुछ व्यथित
इन क्षणों को, शब्दों में समेटने
का, शुरू किया मैंने प्रयास
उठाई, अपनी कलम किताब
और जोड़ा कुछ लिखने का साहस
उतारे, सफ़ेद पन्नो पे फिर
अपने जीवन के कई रंग
कुछ हलके सुनहरे पल
कुछ गहरे गंभीर प्रसंग
इन शब्दों के माध्यम से, करता मैं
अपने अन्त: मन से साक्षातकार
और थोड़े चिंतन मनन पश्चात
कुछ और स्पष्ट हो जाता, जीवन का आकार
इन ही शब्दों में, उतरता मेरा जीवन विवरण
और अक्षर हो जाते ये विस्मृत क्षण
सफ़ेद पन्नो पे लिखता, कुछ आभूषित छंद
कभी थोड़े विस्तृत और कभी चंद
- अंशुमान
इस कविता को मैंने अंग्रेजी में भी लिखा है - उसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे
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