तुम ही धरा के राम हो

 हल धारी बलराम हो

 भुजाओं में धरे पिनाक

 तुम ही परशुराम हो



गदा हो भीमसैन की

हो इंद्र का तुम वज्र भी

गांडीव हो,अर्जुन का तुम

तुम्हीं सुदर्शन चक्र भी

 

डमग डमग डमग डमग

त्रिनेत्र का त्रिशूल तुम

शत्रु के समक्ष हो

साक्षात् महाकाल तुम

 

विकराल तुम विशाल तुम

 शत्रु का हो काल तुम

 अजय हो तुम विजय हो तुम

 शत्रु पे प्रलय हो तुम



प्रतिष्ठा के अधिकारी तुम

सदैव सदाचारी तुम

आचरण के आवरण से

विष्णु का कमल हो तुम


शौर्य बल प्रबल हो तुम

पर धैर्य के पर्याय हो

युक्ति बुद्धि कुशल सदा

किस धरा से उठ कर आए हो



इस धैर्य के निर्वाह को

 शत्रु ने निर्बल जाना 

 प्रज्वलित इस अग्नि कुंड की

 ज्वाला को न पहचाना 

 

प्रथम प्रहार जब किया शत्रु ने

फिर छूटा संयम का साथ

बन कर बिजली टूट पड़े तब

जैसे कई सहस्त्रों हाथ

 

शत्रु को आभास हुआ जब

मृग समान वो सिंह समक्ष

कटे हुए बिखरे थे उनके

चारों तरफ़ अनेक़ो शव

 

हाहाकार मचा शत्रु का

आत्मबल झकझोर दिया

उसकी क्षीण अग्नि को जैसे

 वर्षा बन बटोर लिया


समर यज्ञ का अग्नि कुंड पर

रक्त आहुति लेता है

अपनी लपटों की परिधि में

कयी प्राण हर लेता है

 

इस अग्नि कुंड ने आहुति में

कईओं से बलिदान लिया

धरा के वीर सपूतों ने

निस्वार्थ प्राणों का दान किया

 

भेंट हमें कर विजयश्री फिर 

 अंतिम बार प्रणाम किया

युगों युगों तक रहे अमर

उस गाथा का निर्माण किया


 “कवि अंशुमान”