कभी जब
मेरे बैरागी भाव
अपने पंखों को फैलाते है
अरमान मचल के मुझसे कहते है
छोड़ अपनी प्रतिछाया इस संसार सागर में
तू उड़ चला चल
दूर विस्तृत उस नीले आसमाँ में
हाथ थांमा ज़िन्दगी का तो
वो यूँ ही चलती रहेगी
मेरे मन को भी वो
सीमा रेखाओं में
वहीं कैद कर के रख देगी
और में बैरागी का चोला पहन कर
उड़ जाना चाहता हूँ
नहीं रह सकता बंदिशों में
तुम रखों मेरी प्रतिछाया
मैं कहीं दूर चले जाना चाहता हूँ