स्त्री .... जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना जो प्रेम और साधना की राह दिखाती है तभी तो त्यागा है पुरुषत्व ने उसे कई राहों में इस डर से कि उसका प्रेम , उसकी पूजा पत्थर की मूरत के हृदय में भी प्रेम की कौपलें खिला देंगी ... अंतर्मन की यात्रा की हुई स्त्री जान लेती है मेरा होना , मेरे अस्तित्व का होना भी तो पुरुषत्व से है क्यों लड़ूँ मैं अपने अस्तित्व के लिए जब तुम्हारा होना मुझसे और मेरा होना तुमसे है इसके बिना जीवन कहाँ सार्थक है जीवन संगीत भी तो दो सुरों का मेल है