मेरी नज़रें शर्मसार हैं
आत्मग्लानि है
कि मैं इस दौर में ज़िंदा हूँ...
और देखो तुम..
शायद तुम अब भी देख पा रही होगी
मेरी लाचारी को
मैं ही नहीं हर कोई लाचार सा है
शब्द है अभिव्यक्ति है रोष है लेकिन
सब ख़ामोश
तुम रो चुकी हो इतना..
कि तुम्हारें आँसुओ का एक सैलाब सा है
अब हमारे आँसुओं का इंतज़ार करो
वो शायद आए भी ना..
सब ज़िंदा लाश है हम...
यूँ कहूँ की
शर्मसार हैं हम..
दानव और देवता
सृष्टि के होने में निहित है
फिर कहाँ है वो देवता अब
जिनके होने से सदैव से
ये धरती थमी है