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मेरी नज़रें शर्मसार हैं

मेरी नज़रें शर्मसार हैं आत्मग्लानि है कि मैं इस दौर में ज़िंदा हूँ... और देखो तुम.. शायद तुम अब भी देख पा रही होगी मेरी लाचारी को मैं ही नहीं हर कोई लाचार सा है शब्द है अभिव्यक्ति है रोष है लेकिन सब ख़ामोश तुम रो चुकी हो इतना.. कि तुम
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