आवाहन पूजन और विसर्जन
मुझे न करना आता है
चंचल रहता है चित्त मेरा
मन बार बार घबराता है
प्रसाद पूजा और मंत्रों का
कुछ भी तो मुझको ज्ञान नहीं
क्या करूँ समर्पण चरणों में
साधन सुविधा सामान नहीं
मेरे मन के कोमल भावों को
तुम पुष्प समझ स्वीकार करों
जिव्हा के मीठे बोलो को
प्रसाद रूप अपने अधर धरों
जैसा भी हूँ खोटा या खरा
निर्दोष हूँ , शरणागत खड़ा
मेरे सहज प्रणाम को शक्तिस्वरूपा स्वीकार करो
अपना वृहद हस्त सदा मेरे शीश धरों