अब कहाँ मेरी दुनिया में बसंत समय पर आता है झुलसी हुई गर्म हवाओं से लहराता हुआ बसंत सहम जाता है   अब कहाँ पहली बारिश की बूँदो में वो महक अतिवृष्टि कभी सूखे  से मन सहम जाता है   अब कहाँ गर्मी की लू में वो आम की मिठास रसायन से बने आमों से गर्मी का मज़ा बिखर जाता है   अब सर्द हवाएं ठंडी नहीं लगती अजीब सी जलन इसकी धुप उगलती कोहरे में भी सर्द आलम नदारद है   आसमान भी सतरंगी नज़र नहीं आता दूर का मंज़र भी धुँधला हो जाता है ये कैसा धुंआ मेरे शहर में भर जाता है कड़वी हवा का सा ये आलम हर मौसम का सुकून छीन ले जाता है