प्रेम एक अनैच्छिक क्रिया है

जो तय समय पर 

सोच - विचार कर

नहीं की जा सकती!


स्वत: ही बस हो जाती है

जैसे चोट लगते ही ज़ुबां पर

स्वत: ही आ जाता है

"मां" का नाम!


मेरे अंतर्मन में 

"प्रेम" के उच्चारण साथ

ठीक ऐसे ही बसते हो तुम!


~अंशिका शुक्ला