सुना है बड़ा गुरुर था तुझे वस्ल की रातों पर

फिर कैसे गैरो के पहलू में बैठ मुझे याद किया

तय था तेरे दिए निशानो का चंद दिनों में साफ होना

नामुमकिन है तेरी रूह पर पड़ी छाप का मिटना

अच्छा सुनो

जिस्मों के तो बाजार लग जाते है

रूह के लिए लोग भटकते देखे हैं मैने