चल मान लिया उँचाई भी अछि
पर पक्षी भी तो धरा से उड़ के आकाश पर गया और वापिस आ के डाल पर डटा
ये अंबर तो ना तेरा हुआ ना मेरा हुआ
ये तो उस सितारे से पुछ जो रोशनी के गरूर मे रहा जब गिरा अक्श भी मिटा और भ्रम भी गया
मेरे लिये तो धरा ही सच्ची
जो मेरा अक्श समेट
हर पल मेरे साथ चले


