सामण की या घटा
कालजै लागै
बरसे मेघ दिन रात उरै
बैठी गाऊ गीत जो बैठ
सरहद पै लिखै तनै
एक तेरी धरती बंजर पढ़ी
हरे भरे बाग दिखै चौगरदै
हरी हरी चूड़ी धरी विराजे
झांजर दे दे बोल हार लेयी तनै
सब चा मेरे माटी मै रूलै
कद झूल गलयै देखै बाट डालै
मीठी सुहाली खारी होजै
जब याद तेरी आवै
कोयल कै भी सूर पलट जै
जब हाल मेरे पै निगाह पडै
तेरी सरहद पै तपस्या चालै
हूर तेरी आग मै जलै
इबकै सामण तो आवेगा
बस इसै आस मै दिन कटै

