मेरी लिखी हुई बाते पढ़
कर जमाना सवाल करता है
हम बिछड़ गए क्या
उन्हे कैसे समझाए
रूह तुम्हारी कागज बनती है
और अहसास स्याही
जब जाकर मेरे शब्दों
का सफ़र तय होता है
खैर छोड़ो बड़ी नासमझ
है दुनिया
महसूस करने का सलीका
नहीं और चले है
रूह से रूह तक सफ़र समझने


