जिन आँखो मे समुंदर समझ के कूदा था मैं

असल मे वो दलदल थी फिर अहसास हुआ

हुनर तैराकी का भी फिजूल हैं


जिन हाथो को फूल समझ थाम रहा था मैं

असल मे वो शूल थे कटीले फिर अहसास हूआ

हर मरहम बेकार है

  

जिस चहरे को हीरा समझ तके जा रहा था मैं

असल मे वो टूटा कांच था फिर अहसास हूआ

ये नजरे बस वहम का शिकार है


जिन कदमो के निशान मैं मन्जिल समझ चले जा रहा था

असल मे वो बारिश की खता थी फिर अहसास हूआ

रास्ते ही गलत तय कर रहा था


जिस दिल को घर अपना समझ जिये जा रहा था मैं

असल मे कागजात ही उसके जाली थे फिर अहसास हूआ जीवन ही सारा फरेब था