जब आंख खुली तो माँ की आंखो में

जन्नत मिलने जितना सुख देखा

जब चलना सिखी तो पिता की आंखो में

मज़िल मिलने जितना सुकून देखा

जब बोलना सिखी तो भाई की आंखो

में साज सूनने जैसा एहसास देखा

फिर बाहर निकल कर संसार एक

नया रूप देखा

किसी की आंखो में बेअदबी को देखा

किसी को मेरी चाल का पीछा करता देखा

किसे को मेरे बोलने पर रोक लगाते देखा

किसी में राम का रुप तो किसे में दुशासन दिखा

कैसे समाज में जन्म लिया ये मैने सोचा

खुद को प्यारी गुड़िया से मा बाप की चिंता बनते देखा

कही निर्भया की कथा को सुना

तो कही कल्पना को पढा

कही एवरेस्ट पर झंडा लहराती अनिता को देखा

फिर समाज के हर रुप से लड़ने का होसला किया

एक दिन पिता को खुद का ही दान करता देखा

पता नही कितने विचारो और एहसासो

की लड़ाई से जन्म लेती है

सशक्त बेटियाँ