मेरी आत्मा का डेरा है
एक श्मशान में
नित ना जाने
कितने रिश्तों की
चिता जलती देखती है
निरंतर उस आग में
तप राख में सुकून दूंढती है
वैसे तो निडर है बेहद
पर ना जाने क्यूं आजकल
एक नाते की रूह को
भटकता देख कांप जाती है


मेरी आत्मा का डेरा है
एक श्मशान में
नित ना जाने
कितने रिश्तों की
चिता जलती देखती है
निरंतर उस आग में
तप राख में सुकून दूंढती है
वैसे तो निडर है बेहद
पर ना जाने क्यूं आजकल
एक नाते की रूह को
भटकता देख कांप जाती है