मत हो तू मौन शब्दों का हथियार चलाना होगा
आखों से उतार पट्टी दुर्योधन को पहचाना होगा
कब तक खाकर दोखा खुद के अस्तीत्व को मिटाएगी
होश मे आ साहस कर ईज्जत को बना तू अपनी शक्ति
शर्मसार कर उस पुरुषार्थ का घमंड जो ईज्जत तेरी को करके निलाम
खुद ईज्जतदार का पहन मुखोटा कर रहा समाज को गुमराह निरंतर
लगी है चोट जो तेरी गरिमा पर तो ना देख राह तू कन्हा की
इस युग मे तो तूझे खुद की लड़ाई खुद ही लड़नी होगी खुद ही जटा खून से रंगनी होगी खुद के आत्म-सम्मान की ज्योत का दिया तुझे खुद अपणे हाथ से जलाना होगा
निरंतर उसमे प्रकाश की लौ का प्रण भी तुझे ही उठाना होगा


