वो नदी जो तोड़ कर गुरूर चट्टानों का

पत्थरों को साथ ले तोड़ कर हर बांध 

बेखौफ हो सादगी के साथ

निरंतर प्रवाहित हो 

धरा को नया जीवन दे

समंदर में लीन हुई

हर तरफ शौर था

वजूद का अंत हुआ

लहरों की आवाज ने

मौन कर हर शौर

बतलाया

असल में अंत था

समंदर की तलब का

अहसास हुआ उस पल

प्रेम के शब्दकोश में

मैं का कोई अस्तित्व नहीं 

 ✍️Himanshi sharma