सींचे अपने पसीने से वो धरती माता को

जब जा कर वो सबका पेट भरे

कभी बारिश ने दिया दोखा तो

कभी दिया सरकार ने

हालात से लडे वो दिन रात 

ना हिम्मत हारने की बात करे

मिट्टी के साथ मिट्टी हो कर जिन्दगी 

जीये शान से 

कैसे कर ले सहन वो अपमान

जब बात करे अधिकार की

लाठी लगि ना उसको

लगी उसके सम्मान पर

ये हार नही किसान की 

ये हार है संविधान 

 की