लड़ रोज लड़ाई जज्बातो की खुद को खुद से हरा केदे कर नया रुप अहसासों को रोज एक नया किरदार निभाये
कभी जिन्दगी से लड़ने की प्रेरणा दे तो कभी सकून देने का काम करे
नाजाने कितनी रातो को बना कर दिन रुप शब्दों का बिखारे
कोई दे ताली तो कोई दे गाली हर बात हंस के टाल दे
तुफान कई छुपा कर अल्फाजो के पीछे पल मे नये साज बना दे
फिर खुद को कलाकार कहला भरी भीड़ मे खुद को अकेला भी पा ले
फिर कलाकार की गूँज मे खुद की शक्सियत को खोजे
करके रचना कयी किरदारो की फिर वो खुद को खुद मे ढूंड़े

