चल मान लिया तू दूर मुझसे
मुझे उस दूर से भी दूर होने का डर
तेरा ना होने से ज्यादा किसी ओर का होने का डर
ना है तो ना सही साथ तेरा पर क्यू थाम लू हाथ किसी और का
सब बात करे रिवाज मे बन्द कर किसी ओर का होने की
कैसे कर लू रूह तेरे से आजाद मेरी
चल मान लिया मेल मिले उपर वाले के लिखे नसीब से
तुझसे मिला के भी तो किया होगा हिसाब कोयी
ना तो यू ही तो नही आते फरेब के साहरे ज़िन्दगी जीने के हौसले
ओर ना होते तेरे दूर जाने के फैसले


