बंद थे दरवाजे सब खिड़कियां

 खोलने से भी डर लगता था

 टूटने के डर से हवा के लिए 

 भी तरसा था

 अंधेरों में एक अरसा गुजरा

 तूने जो दी दस्तक चौखट 

 तोड़ कर 

वो कुछ पल की रोशनी

 लम्हे भर की फिजा की खुशबू

एक दुआ सी लगी थी

तेरा यूं वीरान कर जाना 

 गुनाह की सजा सा लगा