इन सूखे झरनों के पत्थर तुम्हे आवाज लगाते हैं 

तुमने तो भर दिए समंदर हमें छुप छुप के रोना पड़ता है 

क्यू मौत मेरी पर तुम अफसोस करते हो

 जिस्म से ही तो निजात पायी हैं

 रूह तो आज भी तेरे पास भटकती देखी है