उस शायर की कलम चलती थीकभी मेरी आंखों की तारीफ मेंकभी मासूमियत के जिक्र मेंदूर क्या हुआमेरे चरित्र की तस्वीरछापने लगाकोई समझाए उसेबैगर जमीर के आदमी कोआइना भी गाली देता है