आसमान से मिलने की भी जिद थी
बादलो की भीड़ से बिना भटके निकलने की भी तरकिब थी
जब सुना गरजते उन बादलो को तो कुछ पल के लिये साँसे भी थमी
फिर जब याद आयी एकांत की वो चीख बाकी सब आवाजे ही मौन हुई
जब कुछ दूर चलके तारो से मुलाकात हूई कुछ देर उस रोशनी ने ठगा तो सही
फिर एक दम से किसी संग गुजरी रात याद आयी
उस रोशनी मे भी कमी कुछ खास पायी
जब पहूंचा पास चांद के बिन पलक झपकाये मुलाकात कुछ खास हुई
फिर अचानक से किसी अक्श की याद आयी फिर उस मुलाकात भी कोई औकात ना रही
जब देख के गरूर मेरा बादलो ने बरसात बेहिसाब की
कुछ पल के लिये तो सहमी
फिर याद किसिका जाना आया ध्यान धड़कनो के ना रुकने पर गया फिर बेखौफ़ हवा बन वहा से निकली


