मेरा आल्ना तोड़ कर
तू खुद का आशियाना सजा लेता है
प्राकर्ति पर अपना हक जमा लेता है
और खुद को खुदा बना लेता है
सोचू मैं भी हताश होकर
मेरा भी बने कोई दफतर
मेरे भी हो कागज तैयार
मेरा भी हो प्राकर्ति पर अधिकार
जब ना मिले कौई जवाब मुझे
फिर हो कर नाराज आसमान मे उड़ू
फिर वहा भी ना कोई स्थान मिले
निराशा ही बस हाथ लगे
फिर मन मे मेरे विचार आए
जिस प्राकर्ति से तुझे श्वास मिले
जब उससे ही तू फरेब करे
फिर मुझ पर कैसे तू रहम करे


