Poetry 1 min read 806.6K reads

आजमाइश


मालूम था उसे शीशे को अपना बना रहा थाजब सलीका नहीं था पास रखने का तोक्यूं संभालने का हौंसला दिखा रहा थाक्या गया तेरी आजमाइश कातू तो पास से निकल गयाना जाने कितने बेगुनाहों केलहू का दाग मेरी रूह को दे गया

Read more Earn more Learn more