मालूम था उसे शीशे को अपना बना रहा था
जब सलीका नहीं था पास रखने का तो
क्यूं संभालने का हौंसला दिखा रहा था
क्या गया तेरी आजमाइश का
तू तो पास से निकल गया
ना जाने कितने बेगुनाहों के
लहू का दाग मेरी रूह को दे गया


मालूम था उसे शीशे को अपना बना रहा था
जब सलीका नहीं था पास रखने का तो
क्यूं संभालने का हौंसला दिखा रहा था
क्या गया तेरी आजमाइश का
तू तो पास से निकल गया
ना जाने कितने बेगुनाहों के
लहू का दाग मेरी रूह को दे गया