विचलित मन है काया त्यागे, 

मिलन हेतु निकट प्रिय भागे। 

रहि-रहि पुनि-पुनि केश सवाँरू,

जोगन बन मैं पंथ निहारूँ। 


~अंशी श्रीवास्तव