गाढ़ी स्याही मुझको अपना

कर्तव्य समझती है

आखिर कैसे तोड़

दू उसका दिल

रंगों का विभाजन!

ठीक तो नहीं है।

शब्द शलिका

जो मिला विरासत में

कैसे त्याग दू उसे

मां के प्यार,और

पिता के विश्वास को तोड़ना

ठीक तो नहीं है।

ना लिखकर

क्या धोखाधड़ी कर दू

निलामग्न इस हृदय से

परमात्मा के “अंश” से

ठीक तो नहीं है।

जो रिश्ता बन गया है

लेखनी से

अब दिल किसी और से लगाना

ठीक तो नहीं है।