कृष्ण थे तुम बांसुरी क्यो छोड़ आए
बाँसुरी तो साधना का थी परोक्षित रूप
तुम्हारे जीवन्म स्वर से जिसमे होता पनपता था हृदय
उसकी हर प्रजाति खोखली दिखती है आज
थे तुम बांसुरी क्यो छोड़ आए
जो नृप द्वारिका की तुम तुम्हारी तर्जनी
अभिमानीत सुदर्शन तानति है
वो तर्जनी कभी कृष्ण की थी
बंसी छिद्रो पर सदा जो सहल करती रही
जो होठ तुम्हारे महारण के सीख देते पार्थ को
उन्ही होठो से वेणु वादन कर दिया होता
तो नाही छीटे रुधिर के पड़ते धरती पर
नाही करुणा से अश्रु के पात्र पैदा होते
छोड़े खड़ग तलवार भाले, सभी पक्ष-विपक्ष
चरणो मे पार्थ बनकर गिर गए होते
जब कर सकते थे संपूर्ण महाभारत का अंत ही ऐसा
तो प्रेम को फिर क्यो अपनुक से मोल आए
थे तुम बांसुरी क्यो छोड़ आए
लड़ गया होता समस्त संसार
से तुम्हे रणछोड़ कहने पर
झुका है शीश मेरा असमर्थ होकर
कृष्ण! तुम तो प्रेमरण ही छोड़ आए
थे तुम जो बांसुरी को छोड़ आए
अब क्यो छुपाते हो भूल अपनी
जलमग्न द्वारिका करके
खोस लेते तुम जो बंसी करिहाव मे अपनी
मेरे लिए
धीश द्वारिका भी कृष्ण का पर्याय होता आज
आखिर क्यो
कृष्ण थे तुम बाँसुरी क्यो छोड़ आए?


