बताऊं क्या कहानी मैं

मृत्यु के मनांतर की

बंधे बंधन पे रोतो की

टूटे धागों में गम रंगी

बहे घावों से खूनो की

वो अंतिम स्वांस जीवन की


लिखूं मैं स्याह से दर्पन

दिखे तो झाक लेना तुम


है मृत्यु दर्द देहो पर

दिखे विश्राम रूहो को

वही पीपल की है छावे

कर्मो सी दुपहरी में


वेदना पर विजय कर गए

जो हर बार ही संभव

वही हस कर गुजारे है

ये ठंडी छांव पीपल की


जिनके सर झुके रह गए

छातो के गुमानो में

उन्हें क्या मर्म मृत्यु की

उन्हें क्या छाव पीपल की।