सब कहते है अब गांव गांव नही रहा

यहा तो अब मोटर का शोर है

अब उन्हें कौन बताए की

यहा परंपरा त्योहारों में नही

प्रत्येक की जीवन शैली में है

विशिष्टता यहा ऊंची इमारत के बनावट में नही

विशिष्टता का उत्तरदायित्व यहा हृदय का है

परम सुख का कारण यहा आधुनिकता नही

यहा सुख वातावरण की बोली में है

नदी की दिन में भी ममत्व गाती लोरी से है

समय का प्रभुत्व लालच की नीव पर नही यहा

यहा लोग हस कर मिलते है

फूल से उसके मुरझा जाने का

कारण तक पूछा जाता है

यहा सड़क नही पगडंडियां है

जिनपर मेहनतकस घासे ओस उठाई हुई है

उनपर से जाते हर कदमों को शीतलता देती है

कठोरता पर गिर कर

यहा लहू खुलेसार नही होती

पगडंडियां सड़क नही है

वो खून की प्यासी नही है

ये गांव है

यहा प्रकृति पे विश्वास की अखंडता है

दुख में सुमिरन करने की मानव विशेषता है

माना अब यहा भी रात फिलामेंट में

ऊर्जा के विस्तार से जलती है

फिर भी यहा,चांदनी का प्रभुत्व है

तारो का अस्तित्व है, अमावस की ठाठ है

यहा अंधी आधुनिकता की वस्त्र शैली नही

घुंघट और गमछे का अनुपम शिष्टाचार है

यहा दिव्यता जगहों पर केंद्रित नही

दिव्यता यहा प्रत्येक के हृदय में दिव्यमान है

और इसलिए मैं आज भी मजबूर हू

गांव को गांव कहने पर ।