आ भर भर जा ए बदरा
मेरी डिबिया मे काजर के
उतारू नज़रे बांझन माटी की
कर श्रृंगार मै दू वसुंधरा की
सजना की आंखे
निहरत है तुझको
दूर फलक सूनी फाटक पे
आ चढ़ दूं सूरमा तुझको
अपनी नग्न नयन की विरासत पे
आप भर भर जा ए बदरा
मेरी डिबिया में काजर के
छटे रंग सूर्य का पीला पीला
आ रंग जा जीवन कलाकृति को
बेह जाए अमृता सारी
मन मृत जागृत हर भोर भोर
आ भर भर जा ए बदरा
मेरी डिबिया मे काजर के
गर सूखी है भोली चिड़ियन की
कर दे संधीपत्र पर हस्ताक्षर
कजरा की मोटी ठोरी से
आ भर भर जा ए बदरा
मेरी डिबिया मे काजर के...।

