कुछ पत्ते थे वो झड़ गये बह गये दूर जाने कहाँ,

मैं नये कोपलों के इन्तज़ार में कब से खड़ा हूँ ,

देखता हूँ इस अनंत, असीम सिन्धु को नित दिन,

गरजते हुए, उमड़ते हुए, बरसते हुए, सिमटते हुए,

ना ये रुके ना ये थमे ना ये व्याकुल हो ना शोक करे,

निडर, निश्छल, निर्मोही, निरंतर ना जाने कैसे,

बस यूँ ही चलता रहे, चलता रहे, चलता रहे, बस चलता रहे।।।