बड़ी आयी मसकली.....
यहां से पहले, यहां से ज्यादा देखा ना था इन्हें कभी,
शन्ति का हैं ये प्रतीक, कहते थे ऐसा सभी,
इस शहर में आकर समझ आया,
ये हैं जैसे हाथी के दांत,
दिखाने के और खाने के और,
शन्ति के क्या खाक हैं ये सैगात,
दिल्ली की तस्वीरों में ये कितने मोहक लगते थे,
लाल किले के गलियारों में ये दाने प्यार से चुगते थे,
कभी कोई परिन्दा बोले कभी मसकली कहलाते थे,
पास जाओ तो फुर-फुर कर आस्माँ में उड़ जाते थे,
उन चित्रकारों की ऐसी-तैसी जो ऐसी तस्वीर बनाते थे,
वो वेले तस्वीरों में इनकी कर्तूतें कहां दिखाते थे,
पर मेरा दर्द वे क्या जाने वे झाडू थोड़ी चलाते हैं,
मैं ही जानू कैसे ये उड़न-खटोले मेरी बाल्कनी रोज़ गंदी कर जाते हैं,
ये परिंदे नही दरिंदे हैं! ये परिंदे नही दरिंदे हैं,
जो ताक में बैठे रहते हैं
मैं जब बार्जे से हट जाती हूँ,
ये फिर कब्ज़ा कर लेते हैं,
सुबह सवेरे गूटर-गूं गूटर-गूं की बेसुरी तान छड़ते हैं,
मेरे बार्जे को सर्व-कबूतर शौचालय ये समझते हैं,
एक आंख से टुकुर-टुकुर ये करते हैं मुआएना,
फिर चुपके से किसी गमले में बना ले आशियाना,
तंग आके मैने भी आपनी बाल्कनी जाली से ढकवा ली,
ठेंगा दिखा के इन सरदर्दों को मैने तस्सली पा ली,
फिर कहीं से एक बोलता कबूतर जाली के उस पार से मुझे चिढ़ाया,
बोला...''देखा कैसे मैनें तुम्हे ही जाल में फसाया,
अब तुम अंदर बन्द रहो और में चला खुले आस्माँ में,
तुम्हरा नहीं तो ना सही मैं चला किसी और मकान में,''
देख के उसकी कारस्तनी मैं झल्लाई सी रह गयी,
जाली किसके लिये लगवाई ये सोचती रह गयी।।।
।।अन्नू।।


