बारिश की रिमझिम फुहारों में किसी टपरी की ओढ़ लिये,हवाओं में घुलती वो ताज़गी की बात ही खास है,

टीने पे टपाटप के शोर के बीच,

दो अजनबी भीगे से गुपचुप आंखों से बात करते हैं और हाथों में चाय की गिलास हैं,

भीनी-भीनी सी एक नये रिश्ते की मीठी सी शुरुआत है...


बार्जे पर खड़े किसी के आने का इन्तज़ार है शायद,

ढलती धूप में किरणों ने दिन को कस कर पकड़ा है और शाम से जंग जारी है,

बगल में चाय का प्याला रखे उसने नज़रे रास्ते पर जमा ली हैं,

टकटकी बांधे फाटक पर उसने आज फिर सांझ अकेले बिता ली है...


हवा सर्द है धूप भी नरम है एक हाथ में रंग का ब्रुश पकड़े,

वो पहाड़ो, को चिनारो को, उपर उठते बादलों को और नीचे बहते सितारों को,

मन के केनवस पर उतार रही है,

चिड़ियों की आवाज भी उसे तस्वीर लग रही है,

वो चाय की प्याली लिये अपने केनवस को निहार रही है....


आस्माँ को ताकते ताकते कुछ शब्द कागज़ पे यू ही फेर दिये,

मैने शाम की आखरी चाय के साथ कुछ खयालों के छीटें भी बिखेर दिये,

छीटें, चाय के कप पर नज़र आ रहे हैं......