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हर एक साल यूँ निकलता जा रहा है!

वो ख्वाबों के परिंदे जिनको आज़ाद किया था हमने,
वो आज रास्ते भटक से गए है।
हम दोनों की ख़्वाहिश पर धूल सी चादर पडी है,मानो किसी ने संदूक में dafn कर दिया हो जेसे
हर एक साल यूँ निकालता जा रहा है!
हालात कुछ ऐसे है हम मिल नहीं सकते
यहां तन्हाई का आलम और बेचैनी के सहारे दिन निकालता जा रहा है,
काश! तुम रहते पास तो
ये घायल इंसान की रूह को पन्ना मिल जाती
तुम्हारे हाथो से लिखे खत को पढ़कर
आज फिर ये दिल टूटा जा रहा है!
हर एक
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