न दीन है मेरा, न मेरा ईमान है
न खुदा है मेरा, न कोई भगवान है
न नज्म पढ़ता हूं उसकी इबादत में
न गंगा के पानी में बसी, मेरी जान है।।
न पंडित का कातिल हूं मैं,
नाही मौलवी को मारा है।
मैंने तो बस गुस्ताखी इतनी की है
घर बसाया है इस श्मशान में।।


न दीन है मेरा, न मेरा ईमान है
न खुदा है मेरा, न कोई भगवान है
न नज्म पढ़ता हूं उसकी इबादत में
न गंगा के पानी में बसी, मेरी जान है।।
न पंडित का कातिल हूं मैं,
नाही मौलवी को मारा है।
मैंने तो बस गुस्ताखी इतनी की है
घर बसाया है इस श्मशान में।।