न दीन है मेरा, न मेरा ईमान है

न खुदा है मेरा, न कोई भगवान है

न नज्म पढ़ता हूं उसकी इबादत में

न गंगा के पानी में बसी, मेरी जान है।।

न पंडित का कातिल हूं मैं,

नाही मौलवी को मारा है।

मैंने तो बस गुस्ताखी इतनी की है

घर बसाया है इस श्मशान में।।