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चल रहा महाभारत का रण,

समरांगण में कौन्तेय – कर्ण,

शर से शर जब भी टकराते,

डर से सब के मन घबराते!

बिखरे पड़े हैं धड़ हीन मुंड,

नभ में छाए गिद्धों के झुंड,

जो भी जीवित बच जाएँगे,

वे कालजयी कहलाएंगे!

रघुपति जैसा पावन पुनीत,

उनसा सुशील उनसा विनीत,

कौरव दल का वह महारथी,

महिमावली जिसकी ‘रश्मिरथी’

इस ओर एकाकी कर्ण लड़े,

सामने पार्थ संग कृष्ण खड़े,

पहिया भूमि ने निगल लिया,

राधेय को इसने विकल किया!

गुरुविद्या भी संग छोड़ चली,

रवि सुत से नाता तोड़ चली,

वह दानवीर अभिशप्त रहा,

श्रापों से नित संतप्त रहा!

था विरथ कवच कुंडल विहीन,

रथ चक्र बाहर करने में लीन,

अर्जुन से तब माधव बोले,

“क्यों चिंतित है मेरे भोले?

तू रथी सारथी मैं तेरा,

तेरे भीतर है बल मेरा,

कर्ता भी मैं कारक मैं हूँ,

मरता भी मैं मारक मैं हूँ!

संहार यहाँ जो मचा हुआ,

मेरी माया से रचा हुआ,

हैं सब माटी के शेर यहाँ,

पल में होंगे सब ढेर यहाँ!

केवल मुझ पर विश्वास तू रख,

ना और कोई भी आस तू रख,

मत कर चिंता कि धर्म क्या है,

बस सोच कि तेरा कर्म क्या है!

जब तेरे सुत को मारा था,

क्या इसने धर्म विचारा था?

वध कर इसका संकोच ना कर,

तू सही गलत की सोच ना कर!

जो यह अवसर ठुकराएगा,

तो जीवन भर पछताएगा,

वसुषेण यदि बच जाएगा,

तो अंत तेरा बन जाएगा!

कर सज्ज उसे सारंग उठा,

तू पाप पुण्य का भेद फुटा,

बस विजयश्री का ध्यान तू धर,

विष युक्त बाण संधान तू कर!”

इतना सुन अर्जुन जाग गया,

मन का सारा भ्रम भाग गया,

तर्कश से बाण निकाल लिया,

भोहों को कुछ विकराल किया!

अर्जुन का तीखा तीर चला,

राधेय की गर्दन चीर चला,

सिर कटा धरा पर आन गिरा,

दुर्योधन का अभिमान गिरा!

कुरु सेना में मातम छाया,

घनघोर घनेरा तम छाया,

पाण्डव पाँचो मुस्काते थे,

जय पर सारे इठलाते थे!

माधव के लोचन भर आए,

यह देख के अर्जुन अकुलाए,

पूछा “केशव क्या बात हुई?

नैनों से क्यों बरसात हुई?

क्या सूत प्रिय मैं प्रिय नहीं?

कुल से तो वह क्षत्रिय नहीं,

इस सूत मरण का गम कैसा?

हृदय में छाया तम कैसा?

योद्धा कई रण में ह्रास हुए,

तुम किंचित भी ना त्रास हुए,

मन हुआ कभी भी खिन्न नहीं,

यह कर्ण वीर कोई भिन्न नहीं!

जब भी मैं बाण चलाता था,

रथ दस पग पीछे जाता था,

मेरा – उसका कोई मेल नहीं,

यह रण सूतों का खेल नहीं!”

तब से थे मौन खड़े मोहन,

विस्मित हो बोल पड़े मोहन,

“सूरज-चंदा का मेल कहाँ,

है तुम दोनों का मेल कहाँ?

निष्कलंक धनुर्धर किर्तिवान,

मुखड़ा मयंक सम दीप्तिमान,

वह वचनबद्ध वह शौर्यवान,

मनुजों का वह भूषण महान!

सोना जब तक ना तपता है,

कुंदन का रूप ना धरता है,

हारक तप कर राधेय हुआ,

देना ही जिसका ध्येय हुआ!

दानी कई जग में बसते हैं,

जो लोभ मान का रखते हैं,

जल दान जो सरिता करती है,

उपकार वो किस पर करती है?

हो धन्य, धन्य तुम धन्य कर्ण,

अगणित गौधन अतुलित स्वर्ण,

निश्छल मन से कर दान गए,

निर्लोभ हो तुम सब मान गए!

दलितों-पिछड़ों का जननायक,

बदलाव गीत का वह गायक,

परिवर्तन की जलती मशाल,

वंचित वर्गों की लोह ढाल!

धर्म कर्ण से इतर कहाँ है,

कर्ण सरीखा मित्र कहाँ है, 

मेरे स्वरूप को जानता था,

वह कालगति पहचानता था!

फिर भी ना उसने प्रण तोड़ा,

दुर्योधन से नही मुख मोड़ा,

वह धर्म मित्रता पाल गया,

हे पार्थ तुम्हारा काल गया!

है कैसा कोप गिरा जग पर,

शंभू का क्रोध गिरा जग पर,

धरती के जन सब त्रस्त हुए,

दिनमान आज दो अस्त हुए!

वसुषेण मृत्यु की ओट गया,

दीपक ज्योति कर लौट गया,

सम धर्मराज उसको मानो,

अपना अग्रज उसको जानो!

वह अमर विभा जाती नभ में,

ज्यों प्रिया समाती वल्लभ में,

कुत्सित विचारों का दमन करो!

तुम हाथ जोड़ उसे नमन करो!”