कभी तू कह रहा आशिक, कभी कहता दीवाना है,
तुझे इस इश्क़ का छोटा सा, इक दर्पण दिखाना है,
लहर वो चूम कर रेती के गालों को यही बोली,
तुझे साहिल पे रहना है, मेरा गहरा ठिकाना है।
अगर वो दूर हो जाए, तो उसकी याद आती है,
कभी दिन के उजालों में, कभी रातों को आती है,
ख़यालों के शहर में है महल सबसे बड़ा उसका,
कभी नज़दीक आती है, कभी वो दूर जाती है।
रात वो ख़्वाब में आई, हकीकत में नहीं आई,
सुनाई दे रही मुझको, उसी के घर से शहनाई,
पता तो है पतंगे को कि अग्नि भस्म करती है,
मगर फिर भी चिरागों की, नहीं करता वो रुसवाई।
आवाजें दे रही हैं जो, सलाखें हैं वो सोने की,
उम्र कच्ची अभी तेरी, नहीं बेचैन होने की,
ज़रा सा थाम ले दो पल उड़न छू हो रहे मन को,
सिसकियों ने भिगोई हैं, बहुत चादर बिछौने की।
कभी ये बर्फ़ सी ठंडी, कभी जलती अंगीठी है,
ये ताली इश्क़ की 'अंकुश', बहुत लोगों ने पीटी है,
मोहब्बत नाम है जिसका आँवले की है वो चटनी,
कभी इमली सी खट्टी है, कभी सीरे सी मीठी है।
किताबें ये मोहब्बत की, कई सदियों पुरानी हैं,
जो किस्से लग रहे ताज़े, पता मुझको जु़बानी हैं,
मुझे मालूम है कि मानेगा ये तू नहीं लेकिन,
जो लफ़्ज़ों में पिरोई है, वो मेरी ही कहानी है।
https://youtu.be/NY3iuTa6F3g
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