कुछ उफान सा चला मेरे मन मे,
लगता महाभारत होने वाली है,
अपने मन की चुनौतियों को,
आँख जो दिखाई है।
मेरे मन का अर्जुन भयभीत,
मोह में आंखे भी भर आयी है,
श्री कृष्ण भी है तैयार,
राह दिखाने की ठानी है।
दुर्योधन भी है बहुत चतुर,
निकलना चाहता मेरे मन से अर्जुन,
विकारों को साथ लेकर,
शकुनि मामा की हर बात मानी है।
हूं जानता दुर्योधन है बहुत घातक,
कर रहा मेरी बुद्धि भ्रमित,
पर धृतराष्ट्र की की तरह मैंने भी,
आंखे बंद कर डाली है।
न जानता क्या होगा कल,
कब होगा ये महाभारत खत्म,
मेरे मन से मन से चला महाभारत
अभी तक जारी है।
© - अंकुश


