"मैं चाहता तो अभी मुंह तोड़ जवाब दे सकता था, सारी अकड़ बाहर आ जाती लाला की, लेकिन हममें कुछ शर्म है, ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए, इसीलिए शांत रहे",बीजू ने खीजते हुए हीरा से कहा।

"अरे अरे... जाने दीजिए, अभी तक उसी में लगे हुए है, हो गया सो हो गया... मिट्टी डालो बात पर, हमें कौन सी रिश्तेदारी निभानी है, जो उसे ही सोचे जा रहे हो", हीरा ने बीजू का धीरज बांधते हुए कहा।

"हाँ, चलो मेरा घर आ गया, आओ तनिक चाय पानी करके जाओ"बीजू बोला।

"अरे नहीं नहीं, घर में सावित्री इंतज़ार कर रही होगी, मेरे बिना खाना नहीं खाती वो, तो घर के लिए ही निकलता हूँ", हीरा ने अपनी पत्नी सावित्री की तारीफ करते हुए, बीजू से पीछा छुड़वाया और अपने घर की ओर चल पड़ा।

रास्ते में सेठ राम लाल पर नजर पड़ी, पहले वो आंख चुरा कर भागने लगा, तभी सेठ ने भी उसे देख लिया, आवाज़ लगाते हुए कहा, हिरवा कहा भागे जा रहे हो, रुको जरा।"

"पाए लागू मालिक, वो देखे नहीं थे आपको, इसीलिए..." हीरा ने धीमी आवाज़ में कहा।

"अच्छा तुम्हारा उधार बाकी है, चलो वो सब बात बाद में करते है, पर मैंने सुना आज लाला और बीजू के बीच कहा सुनी हो गई, बताओ जरा माजरा क्या है।"

हीरा जानता था, सेठ लाला का अच्छा दोस्त है, अब उसकी बुराई करके वो बिना मतलब की मुसीबत नहीं मोल लेना चाहता था।

"वो मालिक आप जानते तो हो न बीजू को, एक नंबर का कामचोर, उधार ले रखा है लाला से, वही कुछ क़िस्त चुकाने गया था, लाला ने बोल दिया कुछ काम करने को, तो बोला, साहब आपसे उधार लिया हूँ, कोई खैरात में नहीं, जो आपके घर के काम करूँ, बस फिर क्या लाला को आया गुस्सा, खरी खोटी सुना दी, अरे सुनाते भी क्यों न, मुफ्त में काम थोड़े करवा रहे थे, जब बिटिया की शादी में बीजू के पास एक ढेला तक नहीं था, तब लाला ने ही तो मदद की थी उधार दे कर।" हीरा ने मिर्च मसाला डाल कर सेठ को सब बता दिया।

"अच्छा ये बात है, मुझे लगा पता नहीं क्या हो गया होगा, खैर तुम कल मेरे घर आना कुछ काम था।" सेठ ने हीरा से कहा।

"जी मालिक जरूर" सेठ से कहते हुए हीरा अपने घर की तरफ बढ़ गया।

सेठ राम लाल नेक दिल का इंसान था, हीरा ने सोचा जरूर कोई फायदे की बात के लिए घर बुला रहे होंगे, ऐसा सोचता सोचता वह घर चला गया

उधर बीजू अपनी पत्नी के पास पूरी आप बीती सुना रहा था, " अरे कर्ज लिया है, गुलाम थोड़े हो गए लाला के।"

"मैं नहीं कहती थी बैंक से उधार ले लो, पर तुम्हें तो सदियों पुरानी प्रथा, जिसने हमारे दादा पर दादाओं तक को नहीं छोड़ा, उन्हीं के पास जाना था।" बीजू की पत्नी ने खुद को मॉडर्न और समझदार बताते हुए बीजू से कहा।

"हाँ वो सब तो ठीक है, पर तुम ही बताओ अब क्या करें, मेरे दिमाग से लाला की बातें नहीं जा रही।"

"अरे सो जाओ अब, किस्मत को अब कौन बदल अगली सुबह:

हीरा कहे अनुसार सेठ के पास गया:

"जी मालिक आपने बुलाया था कल।"

"हाँ, वो कल छोटी को देखने के लिए लड़के वाले आ रहे है, मैं सोच रहा हूँ, इसी खुशी में गाँव वालों के लिए थोड़ा भोज का प्रबंध कर देता हूँ।"

"मालिक ये तो बहुत अच्छी बात है, माता रानी का आशीर्वाद मिलेगा।"

"हाँ तुम ऐसा कर दो की सामने वाले खेत की सफाई कर दो, सारे खरपतवार, हटा दो वहां से।"

हीरा ने सोचा, चलो इसी बहाने कुछ मजदूरी तो मिली, वो जुट गया काम पर, सुबह से दोपहरी हो गई, आधे खेत की ही सफाई हुई थी, उधर बीजू अपने किसी काम से जा रहा था, उसने हीरा को खेत में देखा। हीरा ने सारा माजरा बताया।

शाम हो गई हीरा पूरे खेत की सफाई कर चुका था, वो सेठ के पास गया।

"मालिक... खेत साफ हो गया।"

"अच्छा ठीक है, जाओ कल तुम भी आ जाना भोज के लिए, बाकी सारे गाँव को निमंत्रण दे चुका हूँ।"

"मालिक, वो मजदूरी.. सुबह से काम पर लगा हूँ"

"मजदूरी... अह्म.. किस बात की मजदूरी भई? तुमने कर्ज लिया है न मेरे से, इतना सा तो कर ही सकते हो मेरे लिए।"

हीरा अपनी फूटी किस्मत पर रो रहा था, तभी बीजू वहां से वापिस गुजरा, वो सब कुछ समझ चुका था।

"अरे... ऐसे कैसे मजदूरी नहीं दोगे? कर्ज लिया है, कोई लिखवा के थोड़े लिख रखा है कि तमाम उम्र मजदूरी करेंगे।" बीजू ने गुस्से में सेठ से बोला।

बीजू हालांकि सेठ के नरम स्वभाव से परिचित था, लेकिन ऐसा स्वभाव देख के ताजुब हो रहा था।

"अरे कैसे लेगा पैसे कर्ज लिया है न मेरे से, काम चोर कहीं का, बिना मतलब का बवाल कर रहा है रो धो कर यहां, जाओ यहां से।" सेठ ने थोड़ा चिढ़ते हुए कहा।

"ऐसे कैसे जाएगा, दिन भर मजदुरी करें हम लोग, और फायदा उठाओ तुम, ये सब नहीं चलेगा सेठ जी।" बीजू ने हीरा का पक्ष लेते हुए कहा।

"क्यों हीरा तुम ही बताओ, तुम्हारा धर्म है न मेरी सेवा करना, कोई खैरात में काम ले रहा हूँ क्या? तुम ही बताओ, जब बिटिया की शादी थी, तब लिए थे न उधार, उस वक्त मैं मदद न करता तो कहां जाते?" सेठ ने व्यंग्यात्मक शैली के साथ बोला।

हीरा को सारा माजरा समझ आ गया था, और कल की बात के लिए खुद को कोसने लगा था, इससे पहले की बीजू हीरा के पक्ष से कुछ बोलता हीरा सेठ के पैरों के गिर गया।

"मालिक मुझे माफ़ कर दो, मुझे लगा लाला आपका दोस्त है, इसीलिए कल वो सब बोल दिया था।" हीरा ने रोते रोते सेठ से बोला।

"माफी मुझसे नहीं बीजू से मांगो, वो लड़ा तुम्हारे लिए।" सेठ ने हीरा को पैरों से हटाते हुए कहा।

इधर बीजू कुछ समझ नहीं पा रहा था, तब उसे हीरा ने रोते रोते सब बताया कि कैसे कल उसने सेठ के पास लाला को सही और बीजू को गलत बताया था।

अब बीजू भी समझ गया था, की सेठ उसी बात का सबक सिखाने के लिए ये सब कर रहा था।

सेठ ने हीरा को मजदूरी देते हुए कहा,"तुमने मुझसे कर्ज लिया है, कोई एहसान नहीं कर दिया मैंने, हम भी बैंक से कर्ज लेते रहते है, वो कौन सा हमसे मजदूरी करवाते है, अगर हमारे आसपास के इलाके में बैंक होता, तो मैं सीधी सलाह वहीं से उधार लेने की देता, ताकि कोई भी लाला सेठ के चक्कर में न पड़े। अब पहले सा जमाना नहीं रहा कि हम लोग तुम्हारी प्रताड़ना करते रहें, और तुम लोग चुप चाप सहते रहो, अपने हक़ के लिए लड़ो, जैसे बीजू लड़ा था। और सहयोग करो एक दूजे का, ताकि तुम लोगों को भी खुशहाल जीवन मिल सके, वरना पूरी उम्र ऐसे ही रह जाओगे।"

ऐसा कह कर सेठ ने बीजू को भी कुछ आर्थिक मदद देने की कोशिश की, लेकिन बीजू ने यह कह कर मना कर दिया कि जिस दिन वो मजदूरी करेगा उस दिन अपने हिस्से के पैसे लेगा।

ऐसा कहके सभी ने एक दूसरे को राम सलाम किया और अपने- अपने घर की ओर चल पड़े।

© अँकुश

सकता है।"