जिंदगी के नाम पर,किया जाे हासिल, अहमियत उसकी,अब कुछ भी नही,
अकेलेपण ने आज खुदकाे मिलाया, शिकायत जिंदगी से, अब कूछ भी नही
कुदरत ने खेला है खेल जिंदगी का, इजाजत निकलने की,अब किसीकाे नही,
इंन्सानी बस्ती काे,अब एहसास हुवा है,
हिफाजत जिंदगी मे,अब किसीके नही
नजाने कितने जुल्माें का हिसाब हाे रहा है
माेहब्बत क़ुदरत से, यहां किसिकाे नही
बिना इंन्सान के सबकुछ ताे चल रहा है
इंन्सान की जरूरत,अब किसीकाे नही Ap
