मन विचलित नहीं विचलित मन हो चला है 

न जाने जग कहीं पथ भ्रमित न की भ्रमित पथ हो चला है…


लिखते है चार अक्षर जब हम जीवन के सत्य को मनो कही स्यवं के अर्थ का अस्तित्व को खोज रहा है

रुकता है क्षण कहीं तो मनो तो लगता है की समय का अस्तित्व ही नहीं है

परन्तु समय के स्थान पर क्षण का वास हो चला है

मन विचलित नहीं विचलित मन हो चला है…


देखो जब समय को मानो अनुकूल और प्रतिकूल एक साथ साथ दिखाई पड़त है

मन से बात करे तो आत्मा के स्वर बिखरे से सुनाई पड़तेहै

आज मानो शरीर का आत्मा से विरह हो चला है ।

मन विचलित नहीं विचलित मन हो चला….

 

अहंकार का स्वर मनो संसार का शंख नाद हो चला है

इस स्वर मैं मनो मानव स्वयं को ही भूल चूका है

उस स्वर से मन कहीं दूर चला है

मन विचलित नहीं विचलित मन हो चला….


अँधेरे का समय है ज्यादा सच्चाई का क्षण खोया हुआ है

मानव क्षण मात्र की स्वत्रता के लेकर जीवन मैं बंधक हुआ

मन उस स्वत्रता से दूर चला है

मन विचलित नहीं विचलित मन हो चला है…



लिखना मन की व्यथा मात्र नहीं प्रयत्न तो मन की व्यथा लिखने का है

शब्द को अक्षर कहीं बंधे तो मनो की वो मन पन्नो पर जाग्रत हो उठा है

आज मन उस व्यथा तो त्यागने को चला है

मन विचलित नहीं विचलित मन हो चला है… े