-वो दिन थे बैलगाड़ी के.
बाबा की पीठ के सवारी के
गाँव के मिट्टी के
हौसलों की चट्टान के
खेत के खलियान के
रात में शास्त्रार्थ के
-वो दिन थे बैलगाड़ी के.
तुलसी की आशा के
अंकुर के निराशा के
एक बड़ी सी अभिलाषा के
राम के रहीम के
अल्लाह के करीम के
-वो दिन थे बैलगाड़ी के.
मुट्ठी भर थे पर खुश थे
अहसासों के भी बुत थे
जगह छूटी, समय छूटा
शीतल भी 'कोल्ड' हुआ
अब तो बस सोचते है
-वो दिन थे बैलगाड़ी के.
बैल छुटा गाँव में
गाड़ी आयी शहर में
हवस की की नहर में
अब तो सोचते है
सपनो में ही मिल जाए अपनो में
-वो दिन थे बैलगाड़ी के.