-वो दिन थे बैलगाड़ी के. बाबा की पीठ के सवारी के गाँव के मिट्टी के हौसलों की चट्टान के खेत के खलियान के रात में शास्त्रार्थ के -वो दिन थे बैलगाड़ी के. तुलसी की आशा के अंकुर के निराशा के एक बड़ी सी अभिलाषा के राम के रहीम के अल्लाह के करीम के -वो दिन थे बैलगाड़ी के. मुट्ठी भर थे पर खुश थे अहसासों के भी बुत थे जगह छूटी, समय छूटा शीतल भी 'कोल्ड' हुआ अब तो बस सोचते है -वो दिन थे बैलगाड़ी के. बैल छुटा गाँव में गाड़ी आयी शहर में हवस की की नहर में अब तो सोचते है सपनो में ही मिल जाए अपनो में -वो दिन थे बैलगाड़ी के.