फिल्मों में खलनायक और महानायक, साथ साथ देखता था बचपन से सुध थी उनकी अलग अलग क्षवि की अच्छाई की और बुराई की मगर जिंदगी और फिल्मों में अंतर होता है बहुत अंतर होता है कुछ फिल्मों को जिंदगी में उतार लेते है और कुछ जिंदगी को फिल्मों में कुछ असल जिंदगी में नायक खोज लेते है और फिल्मों में, मेरा नायक था साधारण आदमी जो हर सुबह उठता था नाहाता था खाता था और अपनी छोटी सी दुकान को निकल जाता था मगर अब दुकान भी नहीं बची थी 'उसकी' फिर भी वो रोज कही न कही जाता था महीने में घर का सामान लाता था स्कूल की फीस देता था सब कुछ एक सा था 'मेरे' लिए मगर उसके लिए कुछ अलग ही रहा होगा संघर्ष कर रहा था वो मेरे लिए और घर के लिए बिना किसी को बताये और जताये इसलिए मेरे पिता 'नायक' है मेरे, और हमेशा रहेगें