मानते है प्रगति पथ पर हम बहुत आगे बढे हो, बदलो से और ऊपर चाँद-तारो पर चढ़े हो ! जलधि अम्बर एक करके स्वर्ग धरती पर बनाए, और मरुस्थल पर भी तुमने मृदु अम्बु के अंचल बहाए! ब्रह्म का नितशोध करके ब्रह्म ज्ञानी तुम कहाए, मौत के मुख से भी जिंदगी तुम वापस ले आए ! चाहते क्या कोकिला भी गीत अब गए नही, क्या मधुर पुष्पों के उपवन है तुम्हे भाए नही! नाज से मुक्ति की ऐसी एक दुनिया बनाओ, शान्ति हो सदभाव हो विध्वंश के सभ नाश हो!!