मुझे नहीं पता था कहाँ मिलेगा
कब मिलेगा
कैसे मिलेगा
मगर एक ख्वाब देखा था
मिलेगा जरूर
आज नहीं तो कल मिलेगा
मगर मिलेगा जरूर
यही भरोषा था
कई बार मेरा भरोषा टूटा भी,
कई बार मै लड़खड़ाया भी,
खुद को खोशो दूर पाया
इस छोटे से शून्य से
कई लोगो ने मुझे हाथ दिया
जब भी गिरा उठाया
जब भी सोया जगाया
और वक्त पड़ने बताया
छोटा -
इतना छोटा भी नहीं है शून्य
इतना पास भी नहीं
न जाने कितने और शून्य मिलेंगे
शून्य के इस रस्ते में
मगर मै -
मै तो निकल पड़ा हूँ शून्य की खोज में
न जाने कितना चला हूँ अभी तक
न जाने कितना और चलना है
मुझे नहीं पता
मुझे बस इतना पता है
अगर मै आज जी रहा हूँ
तो बस उस शून्य के लिए
वही तो एक है
जो मेरे लिए मेरे साथ रहता है हमेशा
मेरा - मकशद बनकर
मुझे ऊर्जा देता रहता है
कभी पैदल तो कभी रिक्शे में
कभी बस में कभी मेट्रो में
भटकने का कारण बना रहता है
दिन - रात को समझने की समझ देता है
भूख - प्यास की पहचान देता है
कल क्या करना है बताता है
आज क्या हुआ है गिनाता है
यही शून्य -
हाँ यही तो है
बहुत डराया है इसने रोजाना
कई बार रातो को जगाया है
कोशों दौड़ाया है - मीलो चलाया है
भूखे सुलाया है
अँधेरे में पढ़ाया है
अकेले कई - हाँ कई बार रुलाया है
अब कुछ नहीं बचा उसके पास
तो न जाने कहाँ छुप कर बैठा है
मगर मै हार नहीं मानूंगा
तुझे मै खोज निकलूंगा
या तू मुझे खोजने आएगा !!


