हिंदी 'डे' ताउम्र प्यार करता रहा मगर, तुझे गुरुर रहा हिंदी न बोल पाने का, और मुझे हमेशा गुमा रहा हिंदी अपनाने का, रोजाना चाहता हूँ, बीमार हिंदी के साथ कुछ वक्त गुजारु , न जाने कब गुजर जाए... हिंदी के रोपे गजलो, नज्मो, गीतों को पानी दूँ, कुछ सुख दुःख बांट सकू तो बाटू बीमार हिंदी के. आपने हिंदी को हँसते हुए कब देखा ? सच सच बताना उसे अच्छे से गले भी न लगा सका कहानियो, गीतों और किताबो में मुझे हमेशा हंसाती थी. आज खुद रो पड़ी. कुछ वक्त तो गुजार लूँ हिंदी के साथ, पाल-पोश कर बड़ा किया है उसने। क्या हुआ बीमार है थोड़ा ऊँचा सुनती है अंतिम वक्त में है मगर 'माँ' जैसी है हिंदी, क्या बस मुझे बनाने आयी थी हिंदी जो अब बनाकर चली गयी...