खोखले वादों का शोर चारो तरफ है, सब मसीहा कह रहे है अपने आप को, कल तक एक खेल खेल रहे थे सब - 'मजहब का' हमने सैकड़ो गवां दिए इनके इस खेल में और आज ये कह रहे है , दो - शहीद हो गये हमारे, तीन मार गिराये थे हमने उनके ! अजीब खेल है ये इंसानियत का मजहबो का शतरंज बिछा हुआ है पियांदे कम हो रहे है दोनों तरफ के रोजाना हुक्मराहन कल भी वही थे आज भी वहीँ है !! आखिर क्या होगा इस खेल में जमीन यहीं रहेगी बस इंसान उजड़ जायेंगे !!